Friday, November 14, 2008

One women can change anything . Many women can change everything.

Sunday, September 28, 2008

Trusting in god won,t make the mountain smaller , but will make climbing easier . Do not ask him for a lighter load but ask him for a stronger back.
Believe where others doubt , Work where others refuse , Save where others waste , Stay where others quit And you will win where others lose .......................
If you want to see how rich you are, then don't count your money. just drop a tear from your eye and see how many hands come to hold it .....................

Tuesday, September 16, 2008

Happiness is like a butterfly , u run after it , it flies away bt if u stand still , it comes and sit on ur shoulder .

Wednesday, September 3, 2008

जो बुरी घटनाएं बीत चुकी हैं उन्हें भूल जाना ही अच्छा है नहीं तो वे आपके आने वाले कल को भी बरबाद कर देंगी , बल्कि उनसे सबक लेते हुए अपने आज को सवारना चाहिए ।

(कमला भंडारी)
आसान रास्तों पर हमसफ़र की कमी नहीं होती और
कठिन रास्तों पर हमसफ़र मुश्किल से ही मिलते हैं ।

अपनी बुराइयां अपनों से ही जान लो व ठीक करने की कोशिश करो , दूसरा कहेगा तो बहुत बुरा लगेगा व शर्मिंदा भी होना पड़ेगा ।

(कमला भंडारी )

Sunday, August 3, 2008






कुछ दिनों पहले मैं गोपेश्वर गई थी । पेश हैं आपके लिए वहां के कुछ द्रश्य ।

Monday, July 28, 2008

people and things

" people are made to be loved and things are made to be used " . But the confusion is in the world because people are being used and things are being loved.

Sunday, July 27, 2008

अस्तित्व ----------


कहते हैं इस दौर में लड़कियाँ

बहुत आगे हैं बढ़ रही

कोई छू रही आसमान तो

कोई धरती की गहराई है नाप रही

कोई जीवन दान दे रही तो

कोई दूसरे का आशियाँ है बना रही

कोई दूसरो के हक़ के लिए लड़ रही तो

कोई दहेज़ है एक अभिशाप का पाठ सबको पढ़ा रही

कोई अपना रही बेसहाराओ को

और पराये का भेद मिटा रही ,

तो कोई आज देश की

प्रधानमंत्री , रास्ट्रपति बन

बागडोर संभाल रही ,

पर कौन जाने क्या हो सच

उन पर भी तो हो सकती है कोई मुशीबत

क्या गारंटी है की

जो छू रही आसमान

उसे किसीने धरती पर न पटका हो

और जो गहराई है नाप रही

उसे कोई जख्म न गहरे दे जाता हो

जो जीवन दान दे रही ,घाव भर रही

कौन जाने उसे ही जीने के लाले हों ,

और शरीर पर जाने कितने ही

निशान घाव के गहरे हों ,

जो बना रही दूसरो का आशियाँ

हो सकता है वो ख़ुद ही

सर छुपाने की जगह हो ढूंड रही ,

लड़ रही है जो दूसरो के हक़ की लड़ाई

कौन जाने उससे ही सब लड़ते हों हक़ की लड़ाई ,

दहेज़ है एक अभिशाप

पाठ जो सबको पढा रही

हो सकता है उसके ही ब्याह मे

हो दहेज़ की भारी मांग हो रही ,

जो अपना रही बेसहाराओ को

क्या गारंटी है की

उसका भी कोई सहारा हो

या हो सकता है की सबने

उसको ही पराया कर डाला हो ,

जो कल थी देश की प्रधानमंत्री ,

आज है रास्ट्रपति ,

क्या हो नहीं सकता की

उसकी दुनियाँ भी हो विरान सी

दुखती हो उनकी भी आँखे

पर दिखा नहीं वो पाती हों

क्युकी आज हैं वो

देश के सर्वश्रेष्ठ पद पर ।

Friday, July 25, 2008

आजकल बरसात का मौसम है । घर के बाहर निकलना भी दूभर हो रहा है । सड़क मै जहाँ देखो पानी ही पानी भरा हुआ है, गड्ढे पड़े हुए है । कितनी मुस्किलो का सामना करना पड़ रहा है आम इंसान को । इन नेताओं से कितना भी कहा जाए इनके कान मै जू तक नही रेंगती । अब तो लगता है ये ढीट नेता तब तक नही सुधरेंगे जबतक .......इनके घर के ठीक सामने १० फीट गहरा गड्ढा न खोद दिया जाए वो भी २-३ किलोमीटर तक । तब जाकर शायद इन्हे पता चल पाये की आम जनता ख़राब सड़क के कारण किन - किन परेशानियों का सामना करती है । और हाँ इनके घर के आगे की सड़क को तब तक न बनने दिया जाए जबतक ये आम रास्तो को ठीक नही कराते। आख़िर ये क्यों नही समझते की एक बार अच्छा माल लगा देंगे तो इन्हे बार-बार गालियाँ नही मिलेंगी । शायद इसलिए की माल सड़को पर लगा दिया तो ख़ुद क्या खाएँगे ? सही कहा न !

Saturday, July 19, 2008

आज की शाम मेरे पापा के नाम

पापा मेरे पापा
करती हूँ आपसे प्यार बहुत
पर कह नही मैं पाती हूँ
कहूँ भी तो कैसे कहूँ ?
कर नहीं पाई हूँ अभी तक
आपके उन सपनो को पूरा
जो देखे थे आपने मेरे लिए
जानती हूँ की
मन ही मन दुखी हैं
आप मेरे लिए
देखा है मैंने उस दुःख ,उस दर्द को
टूट गए हैं मेरी विफलताओं से आपफिर भी
मुस्कुराते हैं की
कहीं मैं भी न टूट जाऊं
पापा मेरा वायदा है आपसे आज
नहीं टूटने दूंगी
आपकी उमीदों को ,आशाओं को
क्यूंकि देखा है मैंने
हमेशा आपकी मेहनत ,आपकी हिम्मत को
न दिन का चैन ,न रात ही आराम किया
आठों पहर बस हमारे लिए ही काम किया ।
देखा है मैंने उस चमक
को आपकी आंखो मैं आते हुए
जब भी मैं पास होती थी और
उन आँसुओ को भी
जब मैं बीमार पड़ती थी
मुझे याद है हर लम्हा , हर वो पल
जब आप मेरे साथ खड़े थे ।
कभी डांटना ,कभी मनाना ,
कभी हँसाना ,कभी रुलाना
और फिर अपने हाथों से खाना खिलाना
हाँ पापा सब याद है मुझे
पूरी कोशिश करुँगी ,करती रहूँगी
आपके सपनों को पूरा करने की
जो देखे थे आपने मेरे लिए
पर अगर पास न हो पाऊं तो
दुखी न होना
भले ही मैं कुछ बन न पाऊं
पर जिंदगी का जो
पाठ आपने मुझे पढाया है
नहीं भूलूंगी उसे कभी
और उसी के बल
एक अच्छा इंसान बन जरुर दिखाउंगी
न छोडूगी साथ आपका जीवन भर
लाठी की जगह आपका
सहारा मैं बन जाऊँगी
न होने दूँगी आपका बुढापा नीरस
फिर से आपकी
वही छोटी सी गुड़िया
मैं बन जाऊँगी ।
और एक अच्छी बेटी होने के
सारे फ़र्ज़ निभाऊँगी

हम गुलाम हैं , हाँ हम गुलाम हैं

हम गुलाम हैं , हाँ हम गुलाम हैं । सब कहते हैं आज हम आजाद हैं । पर मै कहती हूँ की हम कल भी गुलाम थे , आज भी हैं और शायद हमेशा रहेंगे । हमे आदत पड़ चुकी है हमेशा गुलाम रहने की । कभी किसी का तो कभी किसी का । कल तक हम अंग्रेजो के गुलाम थे तो आज अंग्रेजी के गुलाम हैं । कल तक अंग्रेज हम पर हुकूमत करते थे हमे शर्मिंदा करते थे तो आज अंग्रेजी हम पर हुकूमत करती है हमे शर्मिंदा करती है कहीं ऐसा न हो की कुछ सालो बाद हमारे देश का नाम हिन्दुस्तान से बदलकर अन्ग्रेजिस्तान हो जाए । जो लोग बच्चों को पढाते हैं चाहे वो मै हूँ या आप । हमेशा अंग्रेजी सिखाने पर ही तुले रहते है ............ ....बेटा , कॉम हियर....................और जो उनके लिए स्कूल खोलते है उन्हें शिक्षा देते है की हम हिन्दुस्तानी है , हमे अपने देश पर गर्व है और होना चाहिये और पढ़ते हैं की आज हम आजाद है । वही लोग अपने स्कूल का विज्ञापन देते समय यह भूल जाते है की हम हिन्दुस्तानी है और हमारी मात्र भाषा हिन्दी है । वे लिखते है ------फ्लुएंस इन इंग्लिश इज मस्ट फॉर अल पोस्ट्स। यहाँ तक की हिन्दी के टीचरों को भी आज इंग्लिश आनी जरुरी हो गई है । ऐसे मैं कैसे समझ पायेगा हमारा समाज की हम हिन्दुस्तानी है ,सच्चे हिन्दुस्तानी । क्युकी आज केवल हिन्दुस्तानी होने की वजह से कई बार शर्मिंदा होना पड़ता है और पड़ रहा है की हमे हिन्दी आती है अंग्रेजी नही । बच्चा वही सीखता है जो हम उसे सिखाते है और आज तो हम बच्चे के पैदा होते ही उसे इंग्लिश सिखाने की कोशिश करने लगते हैं । तो कैसे समझ पायेगा वो नन्हा सा बच्चा की हम हिन्दुस्तानी हैं और यही कारण है की आज हर बच्चा बड़ा होकर विदेश जाना चाहता है । क्युकी आज हम उसे अपने देश से ज्यादा विदेश के बारे मैं ही बताते हैं । वहीं के सपने दिखाते हैं । ऐसे मैं कैसे जुड़ पायेगा वो अपने देश से । उसकी मिट्टी से । आज के हीरो हिरोइन को ही ले लीजिये ---हिट - सुपरहिट होते है अपने देश मै । वो भी हिन्दी फिल्मो की वजह से पर सही से हिन्दी बोलना भी नहीं आता । और जब विदेशी फिल्मो मै काम करते है तू वहाँ उनकी टायं - टायं फिस हो जाती है । फिर भी अपने देश की बजाय विदेश जाना ज्यादा पसंद करते है । क्या नही है हिंदुस्तान मै । सबकुछ है फिर भी .....चलो कभी - कभी तू कोई बात नहीं पर हमेशा तू ये ठीक नही है ना । अब नेताओं को ही ले लो इंग्लिश आती है , अपने प्रांत की भाषा आती है पर जो नहीं आती वो है हिन्दी । प्रधानमंत्री , रास्ट्रपति सब बनना चाहते हैं पर हिन्दी नही सीखना चाहते । तू कैसे समझ पाएगी जनता उन्हें या वे जनता को क्युकी आधे से ज्यादा लोग हिन्दी ही जानते है । अगर ऐसा ही होता रहा तू एक दिन कही ऐसा न हो जाए की जिसके लिए हम जाने जाते है पूरे संसार मै वह वजह ही समाप्त हो जाए । हमे कदम बढाना होगा । जिस तरह हमारे नेताओं ने इंकलाब जिंदा बाद का नारा दिया था उसी तरह हमे भी हिंदुस्तान जिंदा बाद और जैसे अंग्रेजो भारत छोड़ो का नारा दिया था ठीक वैसे ही हमे भी अंग्रेजी भारत छोड़ो के नारे को अपनाना होगा । तभी हमारी खोई पहचान हमे श्याद वापस मिल सके । मै ये नहीं कहती की अंग्रेजी मत बोलो बल्कि ये तू बहुत ही अच्छी बात है की हम दूसरे देशों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल रहे हैं पर दूसरे देश हमारे साथ चलते हुए भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं । वे जहाँ भी रहें , जहाँ भी जाएं अपनी भाषा को नही छोड़ते ,नही भूलते । पर हम हैं की अपनी जड़ों को काटते जा रहे हैं , उनके सामने हमे अपनी भाषा बोलते हुए शर्म आती है ,जबकि वे हमारे सामने अपनों से अपनी भाषा मै ही बात करते हैं । है न कितनी शर्म की बात । जिस तरह हमारे देश मै अंग्रेजी सीखी जा रही है उसी तरह दूसरे देशों मैं भी हिन्दी सीखी जा रही है । पर वो लोग उसे वहीं इस्तेमाल करते हैं जहाँ जरुरत होती है । हमारी तरह नहीं की अंग्रेजी आते ही लगे इतराने । बात - बात पर लगे अंग्रेजी झाड़ने।

Saturday, June 21, 2008

Never worry for the delay in success compare to others coz construction of a pyramid takes more time than a ordinary building

Tuesday, June 17, 2008

कश्मीर युद्ध

जब कश्मीर युद्ध चल रहा था तब एक दिन मैं शाम के समय टी.वी पर एक कार्यक्रम देख रही थी । सब लोग कश्मीर युद्ध पर कुछ न कुछ सुना रहे थे । तभी दिमाग मे ख्याल आया की क्यों न मैं भी कुछ लिखूं क्युकी लिखने का शौक तो मुझे था ही पर पहले या तो शायरियाँ लिखती थी या किसी किताब मैं से कुछ भी अच्छा लगता था तो उत्तार लेती थी ।
ये थी मेरी पहली कविता --------------------------------------



हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की लड़ाई थी
दोनों ही तरफ़ के सैनिकों ने
अपनी - अपनी जान लड़ाई थी
अचनाक दुश्मन लाइन आफ कंट्रोल पर पहुँचा
तो अपने सैनिक ने भी उसे धर दबोचा
बोला आज तुझे मारुंगा और तेरे खून से
अपने देश की प्यास बुझाऊंगा ,
दुश्मन डर गया और बोला
थोड़ा सा अपने मन को मोड़ लो
मेरे प्यारे भाई मुझे छोड़ दो
जाने कौन सी हवा चल गई
अपने प्यारे सैनिक को दया आ गई
सैनिक बोला ठीक है छोड़ दूंगा
तेरे लिए अपना मन भी मोड़ लूँगा
पर मेरी भी एक शर्त है
मान ले यदि तू एक मर्द है
दुश्मन मन ही मन मुस्कान
सोचा ये इसकी भूल है
और बाहर बोला मुझे सब मंजूर है
इत्तिफाक से अपना सैनिक एक कवि था
उसका कवि मन जागा और
इधर - उधर भागा
उसने दुश्मन को कविता सुनाई
दुश्मन की सारी इन्द्रियाँ झ्न्नाई
दुश्मन को कुछ भी समझ नहीं आ रहा
था फिर भी सैनिक के गुण गाये जा रहा था
उम्मीद थी की कभी तो कविता ख़त्म होगी
और उसके दिल की इच्छा भी पूरी होगी
इतने मैं कवि बोला
अरे ! मेरा साहस तो बढ़ाओ
जरा जोर - जोर से तालियाँ तो बजाओ
कवि अपनी कविता सुनाता गया
दुश्मन से तालियाँ बजवाता गया
उसने दुश्मन से ताली बजवाई तबतक
ताली बजाते - बजाते दुश्मन की
जान नही चली गई जबतक
इसतरह सैनिक ने दुश्मन को मिटाया
अपने सैनिक होने का फ़र्ज़
और कवि होने का गर्व
दोनों को साथ - साथ निभाया ।

अगर आप समाज को और करीब से जानना चाहते हैं TO नीचे लिखे लिंक पर क्लिक करें


www.kamlabhandari.blogspot.com

Monday, June 16, 2008

सबसे बड़ा अपराधी कौन ?

बहुत सोचने पर भी मुझे मेरे ही एक प्रश्न का उत्तर आज तक नही मिल पाया । या शायद मिला भी तो मैं उसे स्वीकार नही कर पाई की -------------------

सबसे बुरा कौन है , सबसे बड़ा अपराधी कौन है ?

वो माँ - बाप जो बेटी को पैदा तो कर देते है पर उसे कभी अपना नही पाते , समझ नही पाते , प्यार नही कर पाते , जो उसे बोझ समझते है और शादी कर उससे मुक्त होना चाहते है।

या फिर वो पति , सास - ससुर , नन्द , या इसी तरह के और रिश्ते जो उसे जला कर मार डालते है या जीवन भर उसे जीने नही देते । क्या आपके पास है इसका उत्तर ?

Thursday, June 12, 2008


क्यों करते हो हम लड़कियों पर बंदिसे

क्या बिगाड़ती हम तुम्हारा

देखो , प्यार से कहती हूँ साथ चलो

खुद भी जियो और हमे भी जीने दो

जो "गुस्सा" हमे आ गया

तुम्हारे अत्याचारों का घडा भी अब भर गया

कर जायेंगे हम भी वो सबकुछ

जो तुम "mardjaat" ने कभी सोचा भी न होगा ।


औरत

करती आ रही है

सदियों से

बस इन्तजार ही ,

कभी सुबह का

कभी शाम का ,

क्यों बनाया है हमने

हर दिन , हर घंटा ,

हर मिनट , हर सेकंड

बस उसके लिए ही

"काम "का ?

Sunday, June 8, 2008

वित्त मंत्रीजी जरा ऐ.सी रूम से बाहर निकलिये

एक तरफ़ सरकार कह रही है की महँगाई रोकने की पूरी कोशिश की जा रही है । सभी मंत्री महँगाई पर भाषण दे रहे हैं , वही दूसरी तरफ़ सभी जरुरी चीजों के दाम सरकार द्वारा ही बढाए जा रहे हैं । हँसी आती है मंत्री लोगो के ये डाईलाग सुनकर मुझे । समझ नही आता की सरकार जनता को अनपढ़ , अँधा , मंदबुद्धि समझना कब छोड़ेगी ? रोज़ वित्त मंत्रीजी १० - १० घंटे भाषण देते हैं की महँगाई कम कर रहे है , पूरी तैयारी कर गई है । पर दूसरी तरफ़ पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए हैं और गैस के दाम बाप रे ! ५० रुपये और बढ़ा दिए । तन्ख्वा तो जब बढेगी तब बढेगी पर महँगाई कब की बढ़ चुकी है । सरकारी आंकडों मै तो अभी भी आटे - चावल के दाम ४ - ५ रुपये किलो ही चल रहे होंगे पर हकीकत हम सब जानते हैं । अरे! वित्त मंत्री जी जरा अपने ऐ।सी रूम से बाहर निकलिये , गली - मुहल्लों की दुकानों मै जाकर देखिये वो भी एक साधारण आदमी की तरह तब पता चलेगा आपको आटे - चावल का सही भाव । आपका क्या है आप सब तो नेता अभिनेता , जाने - माने हस्ती , बड़ी - बड़ी कम्पनियों के मालिक हो न घर का सामान खरीदने की झंझट न आम आदमी की तरह १-१ रुपये बचाने का चक्कर । तो कैसे पता चलेगा आपलोगो को की महंगाई क्या है ? आपका काम तो लाखों - करोडों से खेलना व बातें करना भर है । किसानों को क़र्ज़ माफ़ी के लिए जाने कितने अरब बैंको को दे रहे हो । अरे! इसकी जगह अगर महँगाई कम की होती तो क्या जरुरत होती किसानों को आत्महत्या करने की ? क्यों करनी पड़ती है किसी को आत्महत्या सोचा है आप - लोगो ने कभी ? अजी , आप लोग क्यों सोचने लगे ये सब ?आपलोग तो किसानों का क़र्ज़ माफ़ कर उनकी नजरो मै भगवान् बनना चाहते हैं ताकि सारे वोट आपको और आपकी पार्टी को ही मिलें । सो अच्छा आइडिया निकाला है आप-लोगो ने ------------
१) पहले महँगाई बढाओ , भुखमरी फैलाओ ।
२) फिर किसानों को क़र्ज़ लेने के लिए उकसाओ की ब्याज दरें कम कर दी गई हैं । और फिर आत्महत्या के लिए मजबूर करो ।
३) जब १० - १५ किसान आत्महत्या कर लें तब उनकी चर्चा घर - घर फैलाओ ।
४) फिर उनके दुखो का रोना रोकर सहानभूति दिखाकर उन्ही का पैसा उन्ही को भीख मै उन्हें लौटाओ । और अपने - अपने पार्टी का झंडा लहराओ .

Wednesday, May 28, 2008

कितना सुंदर था वो बचपन ,कैसा है ये आज का बचपन

भोला बचपन , प्यारा बचपन
कितना सुंदर था वो बचपन
सुबह देर से उठाना , जल्दी सोना
बिन चिंता सपनो मै खोना
कभी रोना तो कभी हँसना
सबसे अपनी बातें मनवा लेना
कितना न्यारा था वो बचपन
प्यारी सी किताबे रंग बिरंगी
सुंदर कविताएं चाँद तारो की
थोड़ा सा काम ,पूरे दिन आराम
खेल खेलना दोस्तो संग
सूरज की शादी चाँद के संग
गुड्डे - गुडियों से खेला करते थे
बचपन मै झूला करते थे
न चिंता किसी की न फिक्र कोई
पंख बिना ही उड़ जाते थे
सारी खुशियाँ झोली मै भर लेते थे
कभी भागते तितलियों के पीछे
तो कभी नीले आकाश को छुवा करते थे
मम्मी - पापा के प्यारे थे हम
सबके राज दुलारे थे ।


आज का बचपन---------------------

भोला बचपन,प्यारा बचपन
पर जाने क्यों आज
नीरस हो गया बचपन
सुबह जल्दी उठना , रात देर से सोना
चिंता मै सपनो का खोना
हंसने का भी टाइम नही अब
रोने को भी टाइम नही है
हर दम चिंता सताती
पढ़ाई की ही रट लगी रहती
निकलना है सबसे आगे
मम्मी हरदम यही समझाती
खो गई चाँद - तारो की कहानी
हो गई अब ये बहुत पुरानी
अब कोई नही भागता तितलियों के पीछे
न देखता है नीला आकाश कोई
और न अब पंछियों सी ही आजादी है
खेल - खिलोने छुट गए सब
संगी- साथी भी रूठ गए अब
हरदम नंबर आने की होड़ लगी है
सबको पीछे कैसे छोड़ना है
यही जोड़ - तोड़ लगी है
अपना वजन है कम , किताबो का ज्यादा है
इस कोम्पटीसन के जमाने ने तो
बच्चो से बचपन ही छीन लिया है .

Tuesday, May 27, 2008

चाहे तो टीचरों और बच्चो पर एक सर्वे करा कर देख लो

सी.बी.एस.ई को अपने कोर्स मै इस्तेमाल होने वाली किताबो पर ध्यान देना ही होगा। देखना ही होगा की उनसे मान्यता प्राप्त स्कूलों मै कौन - कौन की किताबे इस्तेमाल हो रही है। क्या सिर्फ़ स्कूलों को मान्यता देकर पेसे कमाना ही उनका मकसद हो गया है। उन्हें सोचना ही होगा की किस मकसद के लिए उन्होंने इतनी बड़ी संस्था खोली है ............१)अच्छा नागरिक बनाने के लिए ।
२) दुनिया के साथ कदम के कदम मिलाकर चलाने के लिए ।
३)ज्ञान प्रदान करने के लिए । या फिर ----------------
१)एक सब्जेक्ट के लिए कई-कई रायटरो की किताबो से पैसे कमाने के लिए ।
२)कोर्स को लंबा कर ये दिखाने के लिए की सी.बी.एस.ई स्कूलों मै कितनी पढ़ाई होती है ।
३)या अपनी फीस मै लगातार वृद्धि कर ये दिखाने के लिए की हम भी दुश्रे स्कूलों से कम नही।
अब केंद्रीय विद्यालयों को ही ले लीजिये --------और तो और टीचरों पर भी इतना बोझ डाल दिया है की पूछिये मत ।(मैं ख़ुद ही इसकी गवाह हूँ)। टीचरों को पढाने को कम समय मिलता है और फालतू के कामो पर ज्यादा समय बरबाद होता है । जैसे ही क्लास मै पहुंचे पहले डायरी भरो की कौन सा पीरियड है , कितने बच्चे आए है ,क्या पढ़ना है । कुछ समय इसमे बरबाद हुआ , कुछ समय बच्चो को चुप कराने मै तो पढाने को कितना समय मिला होगा आप ख़ुद ही अंदाजा लगा सकते है । ऊपर से पढ़ना भी उनके हिसाब से ही है जैसे --------आज केवल सुलेख ही कराना है , आज केवल कविता ही पढानी है ,या फिर पाठ के प्रशन - उत्तर ही कराने है । टीचर जब तक स्कूल मै रहते है टेंशन मै ही नजर आते है । कभी डायरी भरते हुए की क्या -क्या पढाया जा रहा है , किस -किस बच्चे ने ग्रह-कार्य नही किया , किसकी ड्रेस गन्दी थी आदि । जब किसी टीचर पर इतना बोझ डाल दिया जायेगा , इतना प्रेसर होगा तो क्या वो ठीक से पढ़ा पायेगा बच्चो को। ख़ुद टीचर ही कहते है की पहले हम बच्चो को पूरा समय देते थे अच्छे से पढाते भी थे पर अब इतना बोझ हो गया की ठीक से पढाने का समय ही नही मिलता। वो ख़ुद कुबूल कर रहे हैं की अब पहले के मुकाबले । सी.बी.एस. ई(केंद्रीय विद्यालयों) मै वो बात नही रही । मै ये नही कह रही की सभी केन्द्रियाविद्यालायो की यही कहानी है पर ९०% की यही कहानी है। (चाहे तो टीचरों और बच्चो पर एक सर्वे करा कर देख लो)।
www.cbse.nic.in
आप भी बच्चो के भविष्य को सुधारना चाहते है उनके लिए कुछ करना चाहते है तो कृपया अपना योगदान जरुर दे ।

Monday, May 26, 2008

पैटर्न और भाषा एकदम घटिया (सी .बी.एस.ई )

पहले आम आदमी भी अपने बच्चो को सी .बी.एस .ई स्कूल मै पढाने के सपने देख लेता था और पढ़ा भी लेता था क्युकी केंद्रीय विद्यालयों की फीस और स्कूलों के मुकाबले बहुत कम थी । पर आज उनकी फीस मै भी तेजी से बढोतरी हो रही है जिससे आम आदमी , यहाँ तक की केंद्रीय कर्मचारी भी अपने बच्चो को केंद्रीय विद्यालयों मै पढाने मै असमर्थ हो रहे है। केंद्रीय कर्मचारियों की तन्ख्वा तो आप लोग जानते ही है। पहले तो फीस किसी तरह भर भी दी जाती थी और किताबे भी सेकेंड हेंड मिल जाया करती थी सो काम चल जाता था। पर अब हर साल किताबे बदल रही है और किताबो के दाम भी दुगने हो रहे है और तो और टीचर हैं की हर तीसरे दिन नए -नए रायटरो की किताबो के नाम गिना देते है। तो कैसे पढ़ा पाएगा कोई कर्मचारी अपने बच्चो को सी.बी.एस.ई स्कूलों मै । और आप तो जाने ही हैं की प्राइवेट स्कूलों की फीस आसमान छु रही है। जहाँ तक बात है कोर्स मै हुए बदलाव की तो पहले जहाँ ये किताबे ज्ञान - वर्धक हुआ करती थी । भाषा भी साफ - सुथरी होती थी और बच्चो को भी पढने मै मजा आता था वहीं अब इन किताबो को पहले से काफ़ी सरल बना दिया गया है पर अब पैटर्न और भाषा एकदम घटिया ।
अब पहले क्लास की एक कविता ही ले लीजिये --------
छ: साल की छोकरी

भरकर लाइ टोकरी
टोकरी मै आम है
नहीं बताती दाम है
दिखा- दिखाकर टोकरी
हमे बुलाती छोकरी
इस कविता को पढिये और आप ही बताइये की क्या सीख पायेगा नन्हा सा बच्चा इस कविता से और हो सके तो सी .बी.एस.ई वालो तक भी इस बात को पहुँचा दीजिये आपकी बहुत मेहरबानी होगी।

Saturday, May 24, 2008

क्या कहते हैं आंकडे ?


एक आंकडे के मुताबिक भारत मै प्रत्येक २६ मिनट मै एक महिला छेड़छाड़ की शिकार होती है , प्रत्येक ३४ मिनट मै उसके साथ बलात्कार होता है , हर ४३ मिनट मै कोई उसका अपहरण कर लेता है और प्रत्येक ९३ मिनट बाद देश के किसी न किसी हिस्से मै उसकी हत्या कर दी जाती है।

बिजनौर के कल्याण सिहं ने पुष्पा देवी के नाक, कान काट दिए

कुछ दिनो पहले टी.वी पर एक खबर देखी । बिजनौर के कल्याण सिहं ने पुष्पा देवी के नाक, कान काट दिए व दांत तोड़ दिए । जानते है क्यों ? क्युकी कल्याण सिहं ने पुष्पा देवी की जमीन हड़प ली थी और कानूनी लड़ाई लड़कर पुष्पा देवी ने अपनी जमीन वापस पा ली । इसी बात से बौखलाये कल्याण ने उसके नाक , कान काट लिए और दांत भी तोड़ दिए । यहाँ सवाल ये उठता है की कल्याण सिहं ने पुष्पा देवी के साथ ही इतनी निर्दयता क्यों दिखाई ? उसके परिवार के अन्य सदस्यों के साथ क्यों कुछ नही किया या कर सका ? शायद इसलिए की वह स्त्री है । जिसे समाज अबला , कमजोर समझता है और पुष्पा देवी तो वैसे भी गावं की है जो शायद उसका ज्यादा कुछ न बिगाड़ सके । कितनी अजीब बात है की चाहे परिवार के लोग हो या बाहर के , सब पहले औरत पर ही अत्त्याचार करते है । आखिर क्यों ? और क्या मिल पायेगा पुष्पा देवी को न्याय ?

Wednesday, May 21, 2008

क्या हर आदमी यू ही आतंकवादी बनता जायेगा ?


आतंकवाद ,

है बहुत बडा विवाद

घिन करते है इससे सब

फिर जाने क्यों, कब

आतंकवादी बन जाते है

खून , कत्ल , तमंचा , हतियार

लूट-पाट और बलात्कार

करते है इससे जुड़ने से इनकार

फिर एक दिन अचानक

जाने क्यों इनके हो जाते है

जो रोते थे कभी

खून देखकर,

आज दूसरो के साथ

खूनी होली खेल मुस्कुराते है

थे ये भी कभी इंसान

जो आज आतंकवादी कहलाते है

कई शौक मै तो कई मजबूरी मै

इसे अपनाते है

किसी ने छीना इनका घर

इनकी दौलत, इनका गुरूर , इनका परिवार

उसी की खातिर अब

ये औरो का घर उजाड़ते है

वैसे कौन ऐसा होगा जो

सब चुपचाप सहता जायेगा

अपने सामने बहन की इज्जत लुटते देख

क्या भाई का खून नही khaul जायेगा

और उसी का बदला लेने की खातिर

वह भी आतंकवादी बन जायेगा

फिर किसी बहन की इज्जत लूट

वह अपनी कसम निभाएगा

और फिर बहन की इज्जत लुटते देख

कोई भाई आंतकवादी बन जायेगा

इसी तरह यह क्रम यू चलता ही जायेगा

बदले की आग मै निर्दोष भी

मौत के घाट उतरता जायेगा ।

पर क्या , इस तरह निर्दोष की जाने लेकर

सही मायने मै कोई

अपना बदला ले पायेगा
और क्या हमपर हरदम

इसी तरह ,

आतंकवाद का साया लहरायेगा

अपना- अपना बदला लेने की खातिर या ,

जल्दी पैसे कमाने की खातिर,

क्या हर आदमी यू ही

आतंकवादी बनता जायेगा ?

Saturday, May 17, 2008

knowledge of ATM

सन १९७० के शुरुआती और मध्य के दशक में पहला आधुनिक ए टी एम इंग्लैण्ड मे स्थापित किया गया था। चुम्बकीय पट्टिका वाले कार्ड भी इसी वक्त पहली बार प्रयोग में आये थे। कार्ड के मानक अमेरिकी बैंकिंग एसोसियेशन द्वारा निर्धारित किये गये थे, जो कि आज भी प्रयोग में हैं। ए टी एम कार्ड को हैक करने वाले लोगो के कारण बैंको ने पिन को एनकोड करने की या कोई अन्य ऐसा माध्यम ढूंढने की कोशिशे करीं, जिससे कि हैकर्स को खाते धारक का खाता विवरण ना मिल सके। उनकी कोशिश यही थी कि ये खोज एक ऐसी प्रणाली इस्तेमाल से की जाए जिसका कि हैकर्स या छात्रों आदि के लिये आसानी से अंदाज़ा लगा पाना कठिन हो।
यद्यपि सुरक्षा का ये तरीका एक अच्छे हैकर के सामने कुछ नही था। और इसी कारण से एटीएम कम्प्यूटर साईंस की शरण में आया। इनके कारण क्रिप्टोलोजी का व्यवसायीकरण हुआ। जो कि कोड और सिफ़र का अध्ययन है। सन १९७० तक क्रिप्टोलाजी पर सैन्य एवं राजनयिकों का एकाधिकार हुआ करता था। कोड की किताबें और सिफ़रिंग की मशीने रेडियो और टेलीग्राफ़िक सिग्नलो के संरक्षण के लिये ही इस्तेमाल की जाती थी। कई सुपर पावरो ने अपने धन और संसाधनो को क्रिप्टोलाजी के विशेषज्ञों को जुटाने में लगा दी थी, उनका एकमात्र ध्येय अपने संदेशों की मज़बूत कोडिंग और विरोधियों के संदेशों की डीकोडिंग करना था। इस बढती हुई क्रिप्टोलाजिस्ट्स की मांग से ऐसी ऐसी तकनीकों का विकास हुआ जो कि अभी तक सेनाओं तथा राजनयिकों द्वारा एक भेद के रूप में छुपा कर रखी गईं थीं। उस समय बैंकों और उनके पूर्तिकर्ताओं (सप्लायर्स) को अचानक एहसास हुआ कि उन्हे क्रिप्टोलाजी तथा क्रिप्टोलाजी की विभिन्न तकनीकों में पारंगत विशेषज्ञों की आवश्यकता है।ये एक नितांत अलग किस्म की क्रिप्टोलाजी थी, चूंकि जहां सेनाओं का ध्यान अपने संदेशों को एक राज़ बनाये रखना होता था वहीं दूसरी ओर बैंको का ध्येय था अपने ग्राहकों की सूचना का सत्यापन करना। हालांकि इस वक्त कम्प्यूटर सिक्योरिटि अपनी शैशवावस्था में थी, और अमेरिकी खुफ़िया एजेंसी एफ़ बी आई के दिशा निर्देशों पर आधारित थी। इस आधार पर तीन तरह के आईडेन्टिफ़िकेशन आंकडे परिभाषित किये गये, ये ऐसे आंकडे थे जो कि यूसर जानता हो। मसलन एक पासवर्ड, ध्वनि पहचान, यूसर के हस्ताक्षर अथवा चेहरे की पहचान। जो यूसर वर्गीकृत सिस्टम को एक्सेस करना चाहते थे, उन्हे इनमें से दो तरह की सुरक्षा जांच से गुज़रना होता था। ये सभी सुरक्षा के तरीके उतने असरदार नही थे जितने कि बैंकों को चाहिये थे। इसी लिये बैंको की सुरक्षा से जुडे लोगो ने उपरोक्त में से दो तरीके अपनाने शुरु करे।
ए टी एम डिज़ाईनर्स ने विभिन्न यूसर्स की पहचान के लिये पहले तरीके को अपनाया।
अब समस्या ये आई कि पिन को सुरक्षित कैसे बनाया जाये। इन सब से निपटने के लिये भांति भांति की तकनीको का विकास हुआ, जिनमे से आई बी एम और वीसा VISA सिस्टम सर्वाधिक लोकप्रिय हुए। आई बी एम के सिस्टम को १९७९ में लांच किया गया जबकि वीसा उसके कुछ बाद मार्केट में आया। इन दोनो तकनीको में पिन को खाते धारक के खाते से सीक्रेट तौर पर जोडा गया था।किसी मानक
ए टी एम सिस्टम मे पिन की कैलकुलेशन कुछ इस प्रकार से होती है।
किसी भी खाते के आखिरी पांच डिजिट ले लीजिये, और उन्हे वैलिडेशन डेटा के ११ अंको से पहले जोड दीजिये। सामन्यत: ये खाते के नम्बर के पहले ११ अंक होते हैं। ये ११ अंक कार्ड की इश्यू डेट का एक फ़न्क्शन भी हो सकते हैं, किसी भी सूरत में अंत में आपके पास आने वाले १६ अंको की वैल्यू ही एन्क्रिप्शन कलन विधि (Encryption Algorithm) होती है। जो कि आई बी एम और वीसा के लिये DES होती है। (US Data Encryption Standard algorithm) और इसका एन्क्रिप्शन १६ अंको की एक की के द्वारा किया जाता है जिसे हम लोग पिन के रूप में जानते हैं। पहले चार अंको को दशमलवीकृत (Decimalised) कर दिया जाता है, और आखिरी चार अंक ही साधारण पिन होते हैं। कई बैंको के द्वारा सिर्फ़ साधारण पिन ही इश्यू किये जाते है। यद्यपि कई बैंको ने आज हमे ये सुविधा प्रदान कर दी है कि हम अपनी पसंद के पिन को चुन सकें।ये चार अंको की संख्या आफ़सेट कहलाती है, जो कि साधारण पिन में जोड दी जाती है जिससे कि ग्राहक अपने ए टी एम से व्यवहार कर सके।

कबतक खेलोगे खूनी होली

आजकल हर अखबार, हर टी.वी चेनल मै बस आतंकवाद , कत्ल और बलात्कार की घटनाएं ही देखने सुनने को मिलती है और मिल रही है। अभी कुछ ही दिनों पहले सी। आर ।पी ।ऍफ़ रामपुर मैं भी आतंकवादियों ने कई सैनिको की जाने ली थी और अब जयपुर मै कई हजार लोगो को मौत के घाट उत्तारकर खूनी होली क्हेली। और भी न जाने कितने ही अपराध किए होंगे । आख़िर कबतक आतंकवादी इसी तरह खूनी होली खेलकर खुशिया मानते रहेंगे और कबतक हमलोग इसी तरह मजबूर और बेबस होकर ये तमाशा देखते रहेंगे ? शायद तबतक जबतक हमारे देश के क़ानून को कड़ा न किया जाए । क्युकी इसी लचीले क़ानून की वजह से ही अभी तक कई खोंकार आतंकवादी खुले घूम रहे है और इस तरह के घिनोने कारनामो को अंजाम दे रहे है। अब तो आतंकवादियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है क्युकी सभी जानते है की लचीले कानून के कारण हिन्दुस्तान मै सजा जल्दी नही हो पाती । केस लंबा और लंबा होता ही चला जाता है और तब तक मुजरिम बचने के सारे रास्ते तलाश कर लेता है और मामूली सजा काटने के बाद छुट जाता है और साथ ही उसके अन्दर का डर भी खत्म हो जाता है जिस कारण वो और भी हेवानियत पर उतर आता है। हर साल आतंकवादी लाखो निर्दोष लोगो की जाने लेते है । पकड़े भी जाते है पर क्या हो पाई है किसी को कड़ी सजा ? क्या लाखो लोगो की जाने लेने वाले किसी भी एक आतंकवादी को मिली है मौत की सजा ? क्या कटी है किसी खुन्कार आतंकवादी की सारी जिंदगी जेल मैं ? जबकि जेल मै जाया जाए तो कई निर्दोष लोग या मामूली जुर्म किए हुए लोग सालो से जेलों मै सजा काट रहे है । जाने किस बात की । यही है हमारे देश का कानून । इसी लिए तो कह रही हूँ इसे लचीला कानून। जब तक कानून को कड़ा नही किया जायेगा , जब तक सख्ती नही की जायेगी तब तक ये घटनाये यू ही होती रहेंगी शायद बढ़ती रहेंगी। बहुत दुःख के साथ कहने को मजबूर हूँ की भगवान् जयपुर मै मरने वाले लोगो की आत्मा को शान्ति दे और उनके परिवार को इस पीड़ा को सहने की शक्ति दे। पर सच्ची श्रधांजलि तो तभी दे पायेंगे जब इस घिनोने कृत्य को करने वालो को कड़ी से कड़ी सजा हो।

Monday, May 12, 2008

३३% का डंका


आजकल महिलाओ को विधान्सभाओ और संसद मैं ३३% आरक्षण पर बहाश जोरो-सोरो पर है । महिला समाज पूरी ताकत झोके है की किसी भी तरह ये पास हो जाए । पर समाज मै एक तबका ऐसा भी है जो ५०% आरक्षण लिए महिलाओ को भटका रहा है । ये वही लोग है जो नही चाहते की महिलाओ को कुछ भी मिले । मैं ये नही कह रही की महिलाये ५०% की हकदार नही। बिल्कुल है । जब हम मर्दो के बराबर या शायद उनसे भी कुछ ज्यादा काम करती है तो क्यों न मिले हमे भी उनके बराबर अधिकार । पर हमे ये भी नही भूलना चाहिए की फालतू की बहाश से कुछ भी हासिल नही होता। ठीक वैसे ही की सरकार ने कहा सड़क बनवायेंगे तो गाव के गाव लड़ पड़े । सड़क हमारे यहाँ से जाए ,हमारे यहाँ से और सड़क कही न जा सकी । बिजली देने को कहा तो फिर वही बहश और सारा जीवन अंधेरे मै ही कट गया। सो बहनो अभी जो मिल रहा है जल्दी झपट लो. इश्से महिलाओ का हौश्ला तो बढेगा ही साथ ही साथ तागत भी बढेगी और आगे की लड़ाई भी कुछ आसान हो जायेगी। क्युकी ३३% आरक्षण मिलना यानी आवाज उठाने वालो की संख्याओ मै और इजाफा होना। तो क्या चाहती है आपलोग सबकुछ या कुछ भी नही ?

"माँ "

ख़ुद भूखी रहकर भी
परिवार को भरपेट खिलाती है
अपने अरमानों का गला घोटकर भी
परिवार की हर जरुरत को पूरा करती है
सारे दुःख सहकर भी
परिवार को सुख देती है
ख़ुद गर्मी मै तपकर भी
परिवार को छाव देती है
ठंड सहकर भी
परिवार को अपने
प्यार की गर्माहट देती है
अपनी लाज बेचकर भी
परिवार की लाज रखती है
वही " माँ "कहलाती है
पर जाने क्यों अंत मै वह
अकेली ही रह जाती है।

चोखेरबाली ने दिया एक स्त्री को धोखा


कुछ दिनों पहले मैं चोखेरबाली से जुड़ी हुई थी पर २ दिन बाद ही उन्होंने मुझे अपने ब्लॉग से निकाल दिया । जानते है क्यों? क्युकी मेने एक साथ २ - ३ पोस्ट कर दी थी। जबकि मेरी कोई गलती नही थी । क्युकी उन्होंने अपने नियमो के बारे मैं कही भी नही लिखा है। इसके लिए मेने उनसे माफ़ी भी मांगी । पर दोबारा उनका कोई जवाब नही आया। चोखेरबाली जो अपने को एक स्त्री का ब्लॉग कहता है क्या उन्होंने मेरे साथ यानि (एक स्त्री ) के साथ धोखा नही किया ? तो क्या सही मायनों मै वो कर पायेंगे स्त्री को धोखा देने वालो का पर्दाफास , क्या दिला पायेंगे स्त्री को धोखा देने वालो को सजा , या फिर उठा पायेंगे स्त्री को धोखा देने वालो के ख़िलाफ़ आवाज। यही नही वहा मेरी एक पोस्ट कुछ समय के लिए रह गई थी . जिसका नाम था "बलात्कार"। जो आप मेरे ब्लॉग मै भी पढ़ सकते है। उसपर मुझे ४-५ कमेंट मिले हुए थे। एक सज्जन ने लिखा था साधारण बक्बास कविता है जिसके जरिये जल्दी प्रसिद्दी पाने की kosish कर रही है। किसी ने लिखा था कमला भंडारी koan है भड़ास पर भी है। तो किसी ने कमला भंडारी koan है। एक सज्जन एषे भी थे जिन्होंने लिखा था बिल्कुल फूहड़ कविता है । एक शालीन स्त्री बार - बार बलात्कार शब्द का प्र्यौग कैसे कर सकती है?
वहा तो मैं इन सवालो का जवाब चाहकर भी नही दे पाई क्युकी जैसे ही मेने अपने जवाब लिखकर पोस्ट की मेरी पोस्ट ही हटा दी गई। इस तरह मन की भड़ास मन मैं ही रही गई। ज्यादा दिनों तक भड़ास को मन मैं रखना मेरे लिए मुश्किल था सो सारे सवालो के जवाब यहाँ लिख रही हूँ।
कमला भंडारी एक साधारण इंसान है और कुछ नही। मैं कोई कवियत्री तो नही शायद इसलिए शब्दों का इस्तेमाल उस तरह नही कर पाई जिस तरह एक कवियत्री कर सकती है , क्युकी मेने लिखना अभी - अभी शुरू किया है । पर मेरी समझ मै ये बात नही आ रही की ज्यादातर पुरुषो को ही आपत्ति क्यों है , शायद इसलिए की बलात्कार शब्द पुरुषो का घिनोना चेहरा जो दिखा देता है । सभी आदमियों का तो नही पर ९०% तो एषे ही है। शायद बलात्कार शब्द सुनते ही पुरुषो को अपने आप पर शर्म आजाती है । सच तो ये है की मर्द्जात मेरे शब्दों को पचा नही पा रहा है। और जहा तक बात है की शालीन महिला इस शब्द का इस्तेमाल केसे कर सकती है तो जरा ये बताइए की जब आपलोग किसी लड़की/महिला को घूरते है ,उसके उप्पर अपनी gandi najre डालते है ,cheetakasi करते है तब क्यों नही देखते की koan सालिन है koan नही। दोस्तो किसी ने कहा है की मै भड़ास पर भी हूँ । तो ये बात अच्छी तरह जान लो की मैं हर उस जगह आपको मिलूंगी जहा मैं अपनी बात कह सकू ,समाज को उसका असली रूप दिखा सकू चाहे वो भड़ास हो ,चोखेरबाली हो या कोई और जगह क्यों न हो।

क्या आप कर सकते है इनकार ?


इस बात से कतई इनकार नही किया जा सकता की आज के कंप्यूटर - आधारित समाज मै हम इंजिनीअर तो बखूबी बना पायेंगे , लेकिन लेखक और कलाकार नही । यानी हम एक ऐसा समाज बनायेंगे , जहा न विचारो की कोई भूमिका होगी और न संवेदना के लिए कोई जगह।

Wednesday, May 7, 2008

एक पैगाम ( हिजडा समाज ) के नाम

आज मनीषा दीदी हायनेस (हिजडा) का ब्लॉग पढ़ा . आपके साथ जिस तरह की बदसलूकी होती है जानकर बहुत ही दुःख हुआ . पर कब तक आप अपने और अपने समाज पर रोना रोती रहेंगी. आपकी हर पोस्ट बस यही कहती दिख रही है की कोई तो हमपर तरस खाओ, हमारे दुखो का रोना रोवो. दीदी आपके दुखो का रोना तो सब रो भी देंगे पर मैं पूछती हूँ की क्या मातृ हमारे रोने भर से ख़त्म हो जायेंगे आपके सारे दुःख ? क्यों ताक रहे है आप दुश्रो का मुह की कोई तो आपकी तरफ़ देखे .यहाँ सब अंधे है,बहरे है जिन्हें अपना ही दिखाई देता है ,अपना सुनाई देता है. बंद करो दुश्रो के आगे गिडगिडाना , मत कहो अपने ऊपर तरस खाने को. वैसे भी जरुरत क्या है आपको किसी की सहानभूति की ? क्यों खाए कोई (हिजडा समाज) पर तरस ? क्या कमी है आपमें ? हाथ है, पैर है , नाक ,मुह ,कान , आँखे सब तो है . शारीरिक बनावट या शारीरिक शक्ति मै थोड़ा सा अन्तर है तो क्या हुआ . इस दुनिया मै लूले, लंगर , गूंगे ,बहरे ,अंधे सब जी रहे है वो भी शान से .जानते है क्यों ? क्युकी उन्होंने अपने अधिकारों को जाना , अपना हक़ माँगा और उनका इस्तेमाल किया. आज उनके लिए स्कूल -कॉलेज है, नौकरी , मान-सम्मान सब कुछ है . आज हिन्दुवो, मुस्लिमों , अपाहिजो, एस .सी ,एस. टी ,महिलावो सबको कोटा चाहिए . सब लड़ रहे है अपने अधिकारों की लड़ाई. तो क्यों सोया है हिजडा समाज . उठो , जागो ,खड़े होवो , मांगो अपने अधिकार, अपना हक़ , अपना कोटा. क्युकी प्यार से भी जरुरी है अधिकार. उस प्यार की कोई कीमत नही जिसमे अधिकार न मिल सके. पता करो संविधान मै आपकी जगह क्या है ,हक़ क्या है , अधिकार क्या है . अपने को एक आम इंसान समझो ,औरो से अलग नही. अपनी मदद ख़ुद करो तभी लोग भी आपकी मदद के लिए शायद आगे आए.कहते है जहाँ चाह है वही राह है . जब तक हिजडा समाज ख़ुद को नही जानेगा ,कौन जानना चाहेगा उसे . मैं आपके साथ हूँ , हम आपके साथ है और यकीन है की सब भी आपके साथ हो जायेंगे.

Sunday, May 4, 2008

आखिर कहाँ है मेरा "अपना घर"

बचपन मै जब बच्ची थी
गुड्डे ,गुडियों से खेला करती थी
खेल छोड़ो कुछ काम करो
कल अपने घर जाना है
बस सब कहा यही करते थे,

फिर जब थोडी बड़ी हुई
पढने की तब बारी आई,
पढो मगर सब काम करो
कल अपने घर जाना है
फिर वही रट सबने दोहराई थी,
बचपन छूटा काम किया,
पढ़ा मगर काम
सुबह- शाम किया।

जब किशोर अवस्था आई
सबने ब्याह की रट लगाई
अब अपने घर जाना है
थोड़ा नही सारा धयान धरो

मेने भी एक सपना बुन लिया
मेरा भी एक ''घर'' होगा,
सबसे ये सुन लिया
सपनो मै रंग सारे भर दिए
जिंदगी के कुछ नए,
रंग मेने भी चुन लिए

फिर ब्याह हुआ,
उस घर को छोड़
इस घर आ गई
एक संतुस्टी सी मन मै लहराई
खूब निहारा,खूब सराहा
सोचा चलो "अपना घर " मिल गया

सपनो के उन रंगो को
जीवन मै जब भरना चाहा
सब चीख उठे ,सब बोल उठे
अरे ! ये क्या कर डाला

अपने घर मै क्या
यही सीखकर आई हो
दुश्रे के घर कैसे रहना है,
क्या अभी तक,
यह समझ नही पाई हो
माथा ठनक उठा ,सर चकराने लगा
कुछ ही पलो मै मानो
दम सा निकलने लगा

" अपना घर"
कौन सा "अपना घर"
उस घर वाले कह्ते
ये है मेरा "अपना घर"
और इस घर वाले कहते ,
वो है तेरा "अपना घर"

न वो घर मेरा
न ये मेरा है
आखिर कहाँ है मेरा
"अपना घर"

lekhika -----kamla bhandari

Tuesday, April 22, 2008

बड़ी शातिर है ये दुनिया

मेरी खामोशियों में भी फसाना ढूंढ लेती है
बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूंढ लेती है
हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने को
मगर हर आंख फिर सपना सुहाना ढूंढ लेती है
न चिडि़या की कमाई है न कारोबार है कोई
वो केवल हौसले से आबोदाना ढूंढ लेती है
समझ पाई न दुनिया मस्लहत मंसूर की अब तक
जो सूली पर भी हंसना मुस्कुराना ढूंढ लेती है
उठाती है जो खतरा हर कदम पर डूब जाने का
वही कोशिश समन्दर में खजाना ढूंढ लेती है
जुनूं मंजिल का, राहों में बचाता है भटकने से
मेरी दीवानगी अपना ठिकाना धुंड लेती है ।

स्त्री एक रूप अनेक



















बबली तेरो मोबाइल , वह रे तेरो स्टाइल

बबली तेरो मोबाइल , वह रे तेरो स्टाइल ....................................................................
चाहे बबली हो या बब्लू , उनके पास कुछ हो या ना हो पर मोबाइल जरुर होगा . लड़किया चाहे पर्श मै मेकप का सामान लाना भूल भी जाए पर मोबाइल कभी नही भूलती .लड़के चाहे पर्श जो उनको सबसे प्रिय है वो तक भूल जाए पर मोबाइल न बाबा ना ---नेवर .बच्चे , बुड्ढे और जवान मागे बस (मोबाइल).मम्मी का पापा का हम सबका प्यारा मोबाइल.और यही नही जिनके पास होता है वो और अच्छा चाहते है ---------ये दिल मांगे मोरे .बाप रे आज की दुनिया कितनी बातूनी हो गई है . ,दुश्रो को देने के लिए भले ही एक रुपैया ना हो पर मोबाइल के लिए हजारो रुपिये पानी की तरह बहा देते है और कोई गम भी नही . आज जिधर देखो लोग बातें बस बातें करते नजर आते है . कोई सड़क के किनारे खडा है , कोई सड़क के बीच भी मोबाइल को कानो से चिपकाए है.
अपनी जान की उतनी परवाह नही है जितनी मोबाइल की . सात से सत्तर के पास भी मोबाइल आम बात है , मोबाइल की दौड़ मै गरीब अमीर का कोई भेद नही , भेद है तो बस सस्ते मंहगे का. एक छोटे से बच्चे को भी खेलने को मोबाइल ही चाहिये और अस्शी साल के बुड्ढे को भी चाहे दांत हो या ना हो, मोबाइल हमेशा रहेगा.
जय हो मोबाइल जी की ।

जान से प्यारा मोबाइलसबसे न्यारा मोबाइल हुमारा प्यारा मोबाइल वैशे मोबाइल जी है बड़े काम की चीज.कुछ भी काम हो चुटकी मै हो जाता है मोबाइल से . और तो
और त्यौहार भी अब मोबाइल पर ही मना लिया जाता है .पहले तो कुछ ही गिने -चुने त्यौहार होते थे पर मोबाइल जी के आते ही इनकी संख्या लाखो मै पहुँच गई है.
आज ये डे ,कल वो डे ,परसों न जाने कौन सा डे ? लोग इतना खुश दोस्त से मिलने पर भी नही होते जितना उश्से मोबाइल पर बातें करने और मेसेज करने पर होते
है ।
वाह रे मोबाइल तेरी महिमा अपरम्पार है।

राजा को रानी से प्यार है मोबाइल पर
सूरज चाँद का यार है मोबाइल परखाना- पीना , सोना- जागना, उठना- बैठना सब भूल गए बस याद रहा तो मोबाइल.अब लड़के को ही देख लो ,घर वालो के काम के लिए चाहे एक मिनट का टाइम ना हो पर अगर प्रेमिका ने मोबाइल घुमाया वो भी मिस कॉल ,मजनू तुरंत हाजिर. और लड़की वो भी कम नही . माँ ने कहा घर का काम करो तुरंत कह दिया पढ़ रही हूँ . ,मजनू का मिस कॉल आते ही (जो उनका कोड नम्बर है) माँ से कह दिया की सहेली के घर पढने जा रही हूँ .चल दी अपने मजनू से मिलने.यही तक सीमित नही है मोबाइल जी की दास्ताँ. अगर कुछ देर के लिए सिग्नल चले जाए तो दुनिया
उलट-पलट हो जाती है ,पागल हो जाते है ,इतने परेशान हो जाते है जैशे सब -कुछ उजड़ गया हो. और अगर कही कुछ दिक्कत आ जाए तो लगे खनख्नाने कॉल-सेंटर.वैसे चाहे कुछ भी कहो ,पर है बहुत ही सुविधाजनक यह मशीन .एकदम अल्लादीन के जादुई चिराग की तरह .किसी से कुछ कहना हो तुरंत कह दिया ,किसी से कुछ पूछना हो ,बताना हो तुरंत कह-पुच लिया. लैला या मजनू को कुछ भेजना हो किसी पास पड़ोसी से कह दिया वो भी तुरंत हो गया .सबकुछ फ़टाफ़ट. भई बहुत ही फायदेमंद है यह पर नुकशान भी कुछ कम नही.....................

१)बिना जाने-पहचाने बतियाने लगे ,खा ली जीने मरने की कसम और फिर खा गए धोका ,लुट गया सब कुछ।
२)बात-बातो मै खोल दिए घर के सारे राज और हो गया घर साफ।
३)हम तो बतियाते-बतियाते छोड़ आए वो गलिया पर वो ना आया।
४)क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार मै।
५)मोबाइल आते ही जाने कौन कौन कंपनिया लगी फ़ोन खंख्नाने ।
६)रात की नींद टूटी दिन का चैन गया।
७)अपने पास होते हुए भी दूर हो गए।
८)त्योहारों का रंग उड़ गया।
९)पैसे पानी की तरह बह गए और हाथ फिर भी खाली।
१०)दिल-दिमाग की बिमारी हुई सो अलग।
११)आनंद धुन्दने चले थे बेचैनी ,मायुशी, ले आए।
१२)दोस्त -दोस्त ना रहा ,प्यार -प्यार ना रहा।
अगर किसी को फायदा हुआ तो सिर्फ़ और सिर्फ़ कम्पनी वालो को.सो डीअर बातो मै न जाओ ,अपनी अक्कल लगाओ.

Monday, April 21, 2008

भगवान् बसते है कहाँ ?

जब निकलती हूँ गलियों मै
देखती हूँ की
हजारो की संख्यावो मै
मन्दिर बसते हैं
पेडो की तलियो मै
बड़ा अच्छा लगता है की
भगवान् है हर जगह
श्रद्धा से सिर
खुद ही झुक जाता है
उन पेडो की तलियो मै
चार ईट लगा दिए और
बन गया मंदिर
जगह - जगह गलियों मै
पर आज दुख होता है
बहुत देखकर यह की
कूड़े के ढेर पड़े है
नालिया बह रही है
उन मंदिरों की गलियों मै
नमन सब करते है
फूल और कुछ
चढावा भी चढाते है
पर कोई नही तैयार
सफ़ाई के लिए
झाडू मारे गलियों मै
लोग भी क्या खूब है
की दान देते है हजारो
बडे मंदिरो मै
श्रद्धा दिखाते है पर
अपने घर के आगे वाली
गली के मंदिर मे
झांकते भी नही
और
सरकार भी तो खूब है
बडे मंदिरो की देखभाल के लिए
जुटी रहती है हमेशा
पर गलियों के मंदिरो की
कीमत कोई नही
अरे ! क्या भगवान् केवल
बडे मंदिरो मै दर्शन देते है
और छोटे मंदिरो का क्या
क्या उन्हें यू ही छोड़ देते है
नही ना !
भगवान् तो बसते है हर जगह
तो फिर क्यों ये
दिखावा और भेद भाव है
और जब तुम
दिखावा और भेदभाव करोगे
तो सच्चे भगवान् को
कैसे पावोगे ।

Sunday, April 20, 2008

PAIN

The pain is not on the day of missing of ur dear , is the pain is really when u live each day without them and with their presence in your mind.

kitne dikhawati ho gaye hum

kitne dikhawati ho gaye hum . naw din durga ki pooja karte hai ,mandir - mandir dhumte hai ,bidhi - vidhan karte hai , wo sab kuch karte hai jisse hume santosh milta hai aur jishse hume sub kuch mil jaane ki sambhawana dikhti hai . caahe iske liye kitne bhi rupe kyu na kharch ho jaaye .
har wah kaam karte hai , har wah dikhawa karte hai jisse hume lagta hai ki mata khush ho jaayegi. naw din brat rakhne ke baad ,pooja karne ke baad mata ke roopo ko (yaani betiyo ko ,ladkiyo ko)ghar par bulate hai , unke charan dhote hai ,unhe bhojan karate hai aur dakshina bhi dete hai .aur hume lagta hai ki mata humse khush ho jaayegi.

par kya insabse hogi mata khush ? kyuki unke rupo ko to hum janam lene se pahle hi maar dalte hai.
jin ladkiyo ko hum poojte hai unki hi garv hattya kar dete hai.bechariyo ko to janam bhi nasib nahi hone dete .maar dalte hai pet me hi . jab hume betiyo se pyar hi nahi hai , jab hume unki jarurat hi nahi hai to kyu poojte hai ushe ? kyu karte hai dikhawa ?

aur hum ye kyu nahi sochte ki hume bhi to kisi ki beti ne , kisi ma ne janm diya hai . humara astitva kewal purush se hi to nahi hai na . aur agar ishi tarha ladkiyo ki bhron hatya hoti rahi to kya is duniya ka astitva rah payega?

YA PHIR ,

aur cheejo ki tarha bacche peda karne ke liye bhi " MACHINE " banwayenge ?

MAI

NA MAI HINDU HUN

NA HI MUSALMAAN

NA MAI SIKKH HUN

NA HI ISAAI

MAI TO HUN

KEWAL

EK SAADHARAN INSAAN

Saturday, April 19, 2008

अनपढ़ की व्यथा


मैं अनपढ़ हूँ

सब कहते है की

मै अनपढ़ हूँ

मै भी कहती हूँ की

मै अनपढ़ हूँ

क्युकी पढा नही है मेने

कभी किसी स्कूल मै

देखा नही किताबो का ,

मुह भी कभी

मेरे लिए काला अक्षर

आज भी है भेंस बराबर

तभी तो सब कहते है

मै अनपढ़ हूँ

जब भी सोचती हूँ

पढ़ - लिखा इंसान कैशा होता है

तब सब कहते है

वह बडे - बडे स्कूल मै पढता है

चतुर , चालाक व बुद्धिमान होता है

क्या उन्हें पढ़ - लिखा कहते है

जो बडे - बडे स्कूल मै पढे

फिर भी हमे पढा न सके

हमारी तो छोड़ दो

जो अपनों के भी हो न सके

क्या उन्ही को कहते है पढ़ - लिखा

किताबे जिन्होंने चाटी खूब

और गरीबो का खून भी

वो चाट गए

हजम कर गए देश की दौलत

कागजो मै सारा काम कर गए .

मैं जानती हूँ की

मै अनपढ़ हूँ

क्युकी मै स्कूल नही गई

जाती भी कैसे

गरीब हूँ

पैसे नही थे उतने

अफ़सोस है मुझे भी, दुख है की

मै स्कूल नही गई

पर सोचती हूँ आज

क्या हर स्कूल जाने वाला

जिंदगी का पाठ भी सीख पाता है

शायद नही ,

क्युकी जो पाठ सीखा है मैंने

भूख से , गरीबी से ,

अपने उप्पर हुए अत्त्याचारो से

यही तो है जिंदगी का पाठ

जो मेने सीखा है हालातों से

शायद वो कभी सीख ना पाए

वैसे मै आजकल

दस्तखत करना सीख रही हूँ

फिर भी सब कहते है

मै अनपढ़ हूँ ।

written by :kamlabhandari

my blog : kamlabhandari.blogspot.com

Wednesday, April 16, 2008

बलात्कार


तन का बलात्कार हुआ

मन का बलात्कार हुआ

एषा लगता है मानो

जिस्म के हर अंग का

बलात्कार हुआ


तन को बिन मर्जी के छुआ

तन का बलात्कार

मन को बिन मर्जी के छुआ

मन का बलात्कार

एषा लगता है मानो

हर अंग का बलात्कार हुआ

जरुरी नही की बलात्कार हमेशा

chu कर हो

बिना छुए भी कई बार

आंखो से बलात्कार हुआ
बाहर ही नही घर मै भी

औरत की साँसों का

उसकी khusiyo का

का जीवन भर बलात्कार हुआ

Tuesday, April 15, 2008

कोन धरम है प्यारा जो बन सके हमारा .

कोन धरम है प्यारा
जो बन सके हमारा .
कोन धरम है प्यारा
जिसे कह सकू मै
ये है मेरा
सब कहते है
मै हिन्दू हूँ
पर मै कैसे कहू
की मै हिन्दू हूँ
क्युकी कर नही पाती
मै पूजा
उनकी तरह
चाहती हूँ
पर नियम नही रख
पाती हूँ
छू लेती हूँ भगवान् को
जब मन चाहता है
उन दिनों मै भी
जिन दिनो एक लड़की को
भगवान् के पास
जाने से भी
किया जाता है मना
क्या करू मै
ना भी छूना चाहू फिर भी छूना पड़ता है मन्दिर को
जब कोई कहता है
मन्दिर से माचिस लाने को
क्या कहू , कैशे कहू
की आज हूँ मै
उनसे अलग
सच कहू तो
कहना नही चाहती
इश अपमान को सहना नही चाहती
क्यों सहू मै गलती क्या है मेरी
ये नही है मर्जी मै हमारी
तो कैशे कहू की मै हिन्दू हूँ
तो कोन हूँ मै
क्या मै मुस्लिम हूँ
नही मै वो भी नही
क्युकी वो भी तो है
नियम के पक्के
और मै
बहुत ही कच्ची
और वहाँ तो
रहती है औरत
परदे मै पर मै तो
उड़ना चाहती हूँ
मन की मर्जी
करना चाहती हूँ
नही है मुझे
परदा प्यारा
वो बाँध देगा
जीवन सारा
तो कोन हूँ मै
क्या मै सिक्ख हूँ
क्यूंकि उन्ही की तरह
मुझे है प्यारी
मेरी खुद्दारी
पर शायद मै
वो भी नही
क्यूंकि सच्चे पंजाबी भी
नियम के पक्के होते है
और नियम
जिनसे मै कतराती हूँ
तो कोन हूँ मै
क्या मै इसाई हूँ
नही मै वो भी नही
क्युकी वो है
पवित्र बाइबल को मानते
और बाइबल
ध्यान देती है
सफ़ाई पर बहुत
वेसे सफ़ाई
मुझे भी है प्यारी
करती भी हूँ
रोज
घर की , कपड़ो की
पर चाहकर भी
कर नही पाती
मन मै भरी
गंदगी की सफाई
और बाइबल
इसी सफ़ाई को है
मानती
समझ नही आता
आख़िर कोन हूँ मै
केसे करू भेद
की कोन धरम है
प्यारा
जो हो सके मेरा
सबके चेहरे
दिखते है एक से
वही दो कान , दो आँखे
एक नाक , एक मुह
और खून का रंग भी
वही गहरा लाल
और करते भी है सब
उसी अद्रश्य
इश्वर , अल्लाह , वाहेगुरु , जीज़स
की पूजा
सब है एक से
फर्क है तो
चमरी का
पर रंग - बिरंगे
चमरी वाले
तो हर धरम मै है
कैशे करू भेद
की कोन धरम है
प्यारा
जो बन सके मेरा ।

Thursday, April 10, 2008

मै देखती हूँ सपने

मै देखती हूँ सपने
कुछ खुली आंखो से
कुछ बंद आंखो के सपने
कुछ ख़ूबसूरत तो
कुछ बद्सुरात सपने
मै देखती हूँ सपने
कुछ प्यारे ,कुछ सबसे न्यारे

कुछ सुख देने वाले
कुछ दुःख देने वाले सपने
मै देखती हूँ सपने
कुछ सफ़ेद , कुछ काले सपने

कुछ अपनों के , कुछ परायो के सपने
कुछ इश दुनिया , कुछ उष दुनिया के सपने
मै देखती हूँ सपने
जानती नही की पूरे होंगे

ये कभी हमारे होंगे
कभी हंसाते कभी रुलाते
फिर भी मै देखती हूँ सपने

पुरूष की कहानी स्त्री की जुबानी


पुरुष का मन कहता है
मै भी समाज का हिस्षा हू
औरो की तरह ,
बात करता है आज समाज
चर्चा करता है
औरतो की , लड़कियों की
बच्चो की , बुद्धों की
अमीरों की , गरीबो की
सबकी करता है
पर करता नही वो
बात कभी (पुरुष की ) मेरी
क्या मै नही समाज का हिस्षा ?
पुरुष हू तो क्या हुआ
क्या मैं इंसान नही
तुम ही तो कहते हो
मै समाज का अहम् हिस्षा हू
फिर क्यों हमेशा मुझसे नजर चुराते हो ।
चर्चा करते हो
औरत की रक्षा कौन करेगा
कौन दिलायेगा उनको हक़ ,
उनका कोटा कौन बढायेगा ,
उनकी लड़ाई कौन लड़ेगा
और महिला दिवश कैशे मनाया जायेगा ।
मैं ये नही कहता
की मुझे भी है
पुरुष दिवश की जरुरत ,
पर पुरुष हू तो क्या हुआ
मै भी तो एक इंसान हू
क्या नही है मुझे भी
रक्षा की , सहानभूति की ,
मदद की जरुरत ।
स्त्री के लिए लड़ने तो
सब आते है
पर मुझे हमेशा ही
अकेला क्यों छोड़ जाते है ?
अगर आशु मै अपने दिखाता नही
दख भी किसी को बताता नही
तो क्या नही है
मुझपर भी चर्चा की जरुरत ?
जानता हू समाज मै
स्त्रिया है काम , पुरुष है ज्यादा
और बनता भी है वो अपने को
सबसे कुछ ज्यादा
पर इंसान होने के नाते
मुझपर भी तो है
चर्चा की जरुरत
मुझे भी है आपके प्यार की जरुरत।

कभी - कभी

मुझे पछतावा होता है कभी - कभी
की मै बेटी हूँ
पर क्या बेटे को भी होता है
की वो बेटा है
मै रोती हू कभी - कभी
की मै बेटी हूँ
पर क्या बेटा भी रोता है
की वो बेटा है
मै हंसती हू कभी - कभी
की मै बेटी हू
पर क्या बेटा भी हँसता है
की वो बेटा है
मै सुनती हू गाली कभी - कभी
की मै बेटी हू
पर क्या बेटा भी सुनता है
की वो बेटा है
मै सुनती हू ताने हमेशा
की मै बेटी हू
पर क्या बेटा भी .......................

ये शादी बड़ी निराली है

ये शादी बड़ी निराली है
किसी की आबादी तो
किसी की बर्बादी है
ये शादी बड़ी निराली है

सपने ये दिखाती है तो
कभी उनमे आग भी लगा जाती है
किसी को समानित तो
किसी को अपमानित कर जाती है
ये शादी बड़ी निराली है

उम्र का बन्धन नही कोई
कभी भी हो जाती है
किसी को ग्राहक तो
किसी को सामान बना जाती है
ये शादी बड़ी निराली है

किसी के जीवन को सुखी तो
किसी को जीवन भर दुखी कर जाती है
किसी को राजा तो
किसी को रंक बना जाती है
ये शादी बड़ी निराली है

किसी की आग बुझा जाती है तो
किसी को आग मै झुलसा जाती है
ये शादी बड़ी निराली है ।

Saturday, April 5, 2008

‪देवी नही इंसान हू मै


हमारे देश मै औरत को कई नाम दिए गए है . उशे कभी 'देवी' के रूप मै पूजा जाता है तो कभी 'अबला' के नाम से जाना जाता है . कोई कहता है नारी ही परिवार को बनाती है और कोई कहता है नारी ही परिवार के टूटने का कारण होती है . कोई कुछ कहता है तो कोई कुछ . हमारे देश मै एक औरत को इतने नाम दिए गए है की आज समाज ही नही जानता की उसकी असली पहचान क्या है ? कभी लगता है वह देवी है इसलिए सब कुछ कर सकती है तो कभी लगता है की वह अबला है , शक्तिहीन है जो कुछ नही कर सकती. मुझे लगता है की यही कारण है की आज भी हमारे देश मै नारी , "एक औरत" अपनी पहचान ढूँढ रही है , जो सायद इन नामो मै कही खो गई है . हम 'पुरुषो' के बारे मै उतनी चर्चा नही करते जितनी 'औरतो' के बारी मै 'क्यों'? अगर एक पुरूष कुछ भी 'सही या ग़लत' करे , उसकी तरफ़ इतना ध्यान नही दिया जाता . पर एक औरत का पल्ला भी अगर ज़रा सा खिसक जाए तो बबाल खडा हो जाता है या यू कहू की बबाल खडा कर दिया जाता है , क्यों ? हम ये क्यों नही समजते , या समझना चाहते की जिस तरह पुरूष एक आम इंसान है उशी तरह एक औरत भी तो आम इंसान ही है . फिर क्यों हम कभी उशे 'देवी ' तो कभी ' अबला ' कहकर पुकारते है ? क्यों कहते है की सुख देने वाली और दुःख देने वाली वही है . परिवार तो सबसे मिलकर बनता है तो क्यों अकेले ही उश्पर ये बोज ढाल दिया जाता है ? यह समाज केवल औरत का ही तो नही है , बल्कि मै कहूँगी की इश समाज मै आज भी औरत कुछ नही है ,फिर क्यों ये समाज औरत को बड़े-बड़े नाम देकर उशे भ्रम मै डाले है ? और जब इशी भ्रम मै आकर वह कुछ करना चाहती है तो उशे "अबला" कहकर फिर सकती -हीन कर दिया जाता है . ये सब ज्यादातर हमारे ही देश मै होता है . क्यों होता है ? या क्यों हो रहा है पता नही ? हम आज अंग्रेज देशो से अपनी बराबरी कर रहे है या करना चाहते है , और अपना देश छोड़कर उनके देशो मै बसना चाहते है . जिस कारण बच्चे के पैदा होते ही उशे अंग्रेजी बोलना सिखाया जा रहा है . जब हम अपनी जड़ को ही अंग्रेज बनाने पर तुले हुए है तो फिर क्यों हम उन्ही की तरह औरत को "आजाद" नही कर देते । क्युकी हम केवल और केवल अपने फायदे के बारे मै ही सोचते है . कही मर्द्जात यह तो नही सोच रहा की अगर औरत को आजाद कर दिया तो जिमेदारी उनके कंधे पर भी आ जायेगी ,केवल बाहर की ही नही घर की भी और वे इश जिम्मेदारी को उठाने मै अपने को सक्सम नही समजते इसलिए डरते है औरत को आजाद करने से.मै बस यही कहना चाहती हू की औरत को देवी या अबला या कोई भी और नाम मत दो . मत भात्काओ उशे की वह अपना असली रूप अपनी असली पहचान ही भूल जाए . उशे अपनी ही तरह एक साधारण इंसान समझो . केवल इंसान . कर दो उशे अलग - अलग नामो के भंधन से आजाद . "आजाद " एकदम "आजाद". और फिर देखो वह भी तुम्हारी ही तरह एक इंसान ,"साधारण इंसान " नजर आएगी जो ना अबला होगी और ना देवी .फिर ना ही पुरूष -स्त्री के उप्पर चर्चा होगी ना फालतू की कोई बहस , न कोई पुरूष ये प्रशन उत्था सकेगा की स्त्री को अहमियत दी जाती है उन्हें नही और ना कोई स्त्री ये कह पाएगी की यह पुरूष का समाज है उश्का नही.सब खुश रहेंगे ,और हम सब चाहते भी यही है ना.ख़ुद जियो औरो को भी जीनो दो ,यही तो एक जिंदगी का रास्ता, तुम्हे अमन का शान्ति का वास्ता.......................

दिल मे मेरे भड़ास है

दिल मे मेरे भड़ास है
कुछ कहने की , कुछ कहलवाने की
कुछ करने की , कुछ करवाने
की कुछ जानने की , कुछ पहचानने
की दिल मे मेरे भड़ास है
man ke अन्दर छिपी बातो परमंद-मंद मुस्काने की
और कुछ बातो पर आंसू बहाने की
ख़ुद को समझने की और समझाने की
दिल मे मेरे भड़ास है
किसी पर नकाब डालने की
किसी का उतारने की
किसी को रुलाने की कभी चुप कराने की
दिल मे मेरे भड़ास है
अपना गुस्षा दिखलाने की किसी का देखने की
अपनी हंशी दिखाने की किसी की देखने की
दिल मे मेरे भड़ास है
किसी को चिढाने की कभी ख़ुद भी चिढ जाने की
किसी को सुधारने की कभी ख़ुद भी सुधर जाने की
दिल मे मेरे भड़ास है
अनसुलझी बातो को सुलझाने की
अनकही बातो को कहलवाने की
मन की गंदगी को भगाने की
हा है मेरे दिल मे भड़ास
और आपके ?

Thursday, April 3, 2008

जुर्म की दुनिया ,जुर्म का school

आप चाहे दुनिया की किसी भी कोने मै रहे , हर दिन आको जुर्म की देह्रो वारदातों के बारे मै सुनने को मिलता होगा , जिनसे रोंगटे खड़े हो जाते है .
आज अपराधियों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है , ये अपराधी कोई और नही बल्कि हमारे ही आसपास के लोग है , हमारे ही दोस्त है , हमारे
ही रिश्तेदार है या हमारे ही पड़ोसी है . आदमी आज इतना मतलबी , लालची , बेईमान और क्रूर हो गया है की अपने मतलब के लिए वो अपने बाप को
भी मौत के घाट उतार देता है ।

आज हर आदमी के मुह से यही सुनने को मिलता है ------------------(बाप बड़ा न बहिया , सबसे बड़ा रुपैया) कोई भी बाही को बाही नही समज्ता , दोस्त को दोस्त नही समज्ता , हर कीमत पर बस अपना मतलब निकालना कहता है फिर उशे किसी की जान ही
क्यों ना लेनी पड़े .और इस तरह पहुँच जाता है वह जुर्म की दुनिया मै और खानी पड़ती है जेल की हवा .पर क्या जेल जाने के बाद , सजा काटने के
बाद वह सुधर जाता है ? क्या होता है उशे अपने किए पर पछतावा ? नही , बल्कि .............." एक बार जेल की सजा काटने के बाद मुजरिम पहले
से भी ज्यादा चालाक और होसियार बन सकता है . वह दुश्रो का नाजायज फायदा उठाने से और जुर्म करने से बिल्कुल भी बाज नही आता .कहते है जेल
जुर्म का स्चूल है . सही कहते है क्युकी "ज्यातर मुजरिम तजुर्बे से ऐशी खतरनाक बातें सीखते है , जो समाज नही caahtaa की वो सीखे ." जेल
मै केदियो के पास अप्रादी बनने का वक्त- ही - वक्त होता है . इसके अलावा ,वे क़ानून को चकमा देने मै उस्ताद हो जाते है . जेल मै वह दुश्रे अपराधियों
से नए - नए हत्कंडे सीख लेता है और दुश्रो को भी कुछ हत्कंडे सिखा देता है ."एक जवान गुनाह करता है , पर जेल की हवा खाने के बाद वह जुर्म का
'गुरु' बन जाता है." केवल १००० मै से १० मुजरिम ही एषे होते है जो जेल की हवा खाने के बाद सुधर जाते है बाकी ..............................................बड़े उस्ताद बन
जाते है .कई अपराधी एषे भी होते है जिन्हें सबूत ना मिलने के कारण छोड़ दिया जाता है , इसलिए वे इश नतीजे पर पहुँच जाते है की जुर्म करना
फायदेमंद है और वे और भी hateele बन जाते है और घुसते चले जाते है बुराई के समुन्दर मै ।


जुर्म की दुनिया मै जाना मजबूरी है, या अपनी मर्जी से ?
-------------------------------------------------------

कुछ लोगो को लगता है की इश संसार मै जीने के लिए , उनके आगे सिर्फ़ एक ही रास्ता है और वह है , जुर्म की दुनिया मै जाना . क्या यह सच है ? हम सोचते है की चंचल मन वाले , गरीबी की चक्की मै पिस रहे या फिर जिंदगी से हार चुके लोग ही जुर्म की दुनिया मै जाते है . पर sach नही है यह . अमीर , पढे - लिखे , नामी
लोग भी आज जुर्म की दुनिया मै पहुँच चुके है . इश्से यही नतीजा निकलता है की ............लोग अपनी मर्जी से जुर्म करने का चुनाव करते है .
"जुर्म........की 'जड़' एक इन्शान के हालत नही बल्कि उसकी अपनी soch होती है . " हम jeshaa सोचते है , weshaa ही करते है . हम
कोई भी काम करने से पहले सोचते है , उशे करते वक्त सोचते है और उशे पूरा करने के बाद भी सोचते रहते है . इसलिए हम कह सकते है की " मुजरिम बेबस नही होते बल्कि वे दुश्रो को बेबस बनाते है और जुर्म की दुनिया मै कदम रखने का चुनाव अपनी मर्जी से
करते है ". "जिंदगी की बेहतर बनाने के चक्कर मै बहुत से सहरी जवानों ने (अपराध को चुना अपना kariyar " .भगवान् ने इंसान को आजाद मर्जी
के साथ बनाया है , इसलिए वह मुश्किल - से - मुश्किल हालत मै भी अपना रास्ता ख़ुद चुन सकता है . इसमे कोई दो raai नही है की लाखो लोग
हर दिन तंगहाली मै जीते है और समाज मै हो रहे अन्याय का सिकार होते है . या फिर हो सकता है , वे एषे परिवार मै रहते हो जिनमे लड़ाई होना
रोज की बात है . मगर फिर भी , ये लोग कुख्यात अपराधी नही बनते . "जुर्म बुरे maahol , लापरवाह माँ - बाप ,...............या बेरोजगारी
की वजह से नही होते , बल्कि अपराधियों की वजह से होते है । इसकी सुरुवात एक इंसान के दिमाग से होती है , ना की समाज के बुरे हाल से।


" जुर्म की 'जड़'.........................(मन )
------------------------------------------

बाइबिल बताती है की एक इंसान के पाप की वजह उसके हालत नही , बल्कि उसका मन होता है । " जब एक इंसान अपनी किसी बुरी इच्छा के बारे दिन - रात सोचता रहता है , तू वह दरअसल उशे अपने दिल मै पनपने दे रहा होता है . फिर यह इच्छा उष पर इश कदर हावी हो जाती है की मोका मिलते ही वह खतरनाक काम कर बेठता है ।

उदहारण के लिए.........................जब एक insaan कभी - कभार अश्लील तस्वीरे देखता है , कुछ समय बाद उष पर ग़लत काम करने का जूनून सवार हो सकता है . फिर एक दिन इश जूनून मै आकर वह ghinoni हरकत कर सकता है . यहाँ तक की इसके लिए वह जुर्म का रास्ता तक इक्तियार कर सकता है . आज दुनिया फिल्मो , wediyo गेमो , gande साहित्य , इंटरनेट , मोबाइल और वो जाने - माने हस्ती jinkaa charitra सही नही है के जरिये जुर्म की दुनिया मै जा रहे है .इन सब चीजो के रंग मै रंग रहे है . उन्ही का अनुसरण कर rahe है . इनसब चीजो मै जो अच्छी बातें है वो उनकी तरफ़ ध्यान नही dete पर ग़लत चीजो को तुरंत अपना लेती है और अपना रही है . आज इनसब चीजो के फायदे कम नुकशान ज्यादा नजर आ रहा है .अफ़सोस उनका यही रवैया जुर्म की आग मै घी का काम करता है . लेकिन
यह जरुरी नही की हर इंसान , दुनिया के इश रंग मै रंग जाए।


क्या हम जुर्म की दुनिया से बाहर निकल सकते है ?
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जो इंसान एक बार जुर्म की दुनिया मै चले जाते है, मुजरिम ban जाते है , इसका यह मतलब नही की वह जिंदगी भर मुजरिम ही बना रहेगा . जैशे एक इंसान ,
जुर्म की दुनिया मै जाने का चुनाव करता है , weishe ही वह "जुर्म की दुनिया से निकलकर एक साफ-सुथरी जिंदगी जीने का भी चुनाव कर सकता है ."अनुभव दिखाते है की लोगो की चाहे किसी भी maahol मै परवरिश क्यों ना हुई हो , वे बदल सकते है , बसरते उनमे एषा करने की इच्छा हो . "जो-जो बातें सत्य हो , जो - जो बातें अच्छी हो, जो - जो बातें सुहावनी हो , जो - जो बातें sadgun की हो ,प्रसंसा की हो , प्रभु की हो ,अच्छे इंसानों की हो ,नेक इंसानों की हो उन्ही का हमेशा ध्यान करो , उन्ही के बारे मै सोचो ,उन्ही के रास्ते पर चलो.समय का sadupyog करो ,काम मै मन लगाओ .तभी तुम्हारा मन saant रहेगा ,स्थिर रहेगा.और तुम कह sakoge की हां हम जुर्म की दुनिया से बाहर निकल सकते है बल्कि निकल आए है .............................