Monday, April 21, 2008

भगवान् बसते है कहाँ ?

जब निकलती हूँ गलियों मै
देखती हूँ की
हजारो की संख्यावो मै
मन्दिर बसते हैं
पेडो की तलियो मै
बड़ा अच्छा लगता है की
भगवान् है हर जगह
श्रद्धा से सिर
खुद ही झुक जाता है
उन पेडो की तलियो मै
चार ईट लगा दिए और
बन गया मंदिर
जगह - जगह गलियों मै
पर आज दुख होता है
बहुत देखकर यह की
कूड़े के ढेर पड़े है
नालिया बह रही है
उन मंदिरों की गलियों मै
नमन सब करते है
फूल और कुछ
चढावा भी चढाते है
पर कोई नही तैयार
सफ़ाई के लिए
झाडू मारे गलियों मै
लोग भी क्या खूब है
की दान देते है हजारो
बडे मंदिरो मै
श्रद्धा दिखाते है पर
अपने घर के आगे वाली
गली के मंदिर मे
झांकते भी नही
और
सरकार भी तो खूब है
बडे मंदिरो की देखभाल के लिए
जुटी रहती है हमेशा
पर गलियों के मंदिरो की
कीमत कोई नही
अरे ! क्या भगवान् केवल
बडे मंदिरो मै दर्शन देते है
और छोटे मंदिरो का क्या
क्या उन्हें यू ही छोड़ देते है
नही ना !
भगवान् तो बसते है हर जगह
तो फिर क्यों ये
दिखावा और भेद भाव है
और जब तुम
दिखावा और भेदभाव करोगे
तो सच्चे भगवान् को
कैसे पावोगे ।

Sunday, April 20, 2008

PAIN

The pain is not on the day of missing of ur dear , is the pain is really when u live each day without them and with their presence in your mind.

kitne dikhawati ho gaye hum

kitne dikhawati ho gaye hum . naw din durga ki pooja karte hai ,mandir - mandir dhumte hai ,bidhi - vidhan karte hai , wo sab kuch karte hai jisse hume santosh milta hai aur jishse hume sub kuch mil jaane ki sambhawana dikhti hai . caahe iske liye kitne bhi rupe kyu na kharch ho jaaye .
har wah kaam karte hai , har wah dikhawa karte hai jisse hume lagta hai ki mata khush ho jaayegi. naw din brat rakhne ke baad ,pooja karne ke baad mata ke roopo ko (yaani betiyo ko ,ladkiyo ko)ghar par bulate hai , unke charan dhote hai ,unhe bhojan karate hai aur dakshina bhi dete hai .aur hume lagta hai ki mata humse khush ho jaayegi.

par kya insabse hogi mata khush ? kyuki unke rupo ko to hum janam lene se pahle hi maar dalte hai.
jin ladkiyo ko hum poojte hai unki hi garv hattya kar dete hai.bechariyo ko to janam bhi nasib nahi hone dete .maar dalte hai pet me hi . jab hume betiyo se pyar hi nahi hai , jab hume unki jarurat hi nahi hai to kyu poojte hai ushe ? kyu karte hai dikhawa ?

aur hum ye kyu nahi sochte ki hume bhi to kisi ki beti ne , kisi ma ne janm diya hai . humara astitva kewal purush se hi to nahi hai na . aur agar ishi tarha ladkiyo ki bhron hatya hoti rahi to kya is duniya ka astitva rah payega?

YA PHIR ,

aur cheejo ki tarha bacche peda karne ke liye bhi " MACHINE " banwayenge ?

MAI

NA MAI HINDU HUN

NA HI MUSALMAAN

NA MAI SIKKH HUN

NA HI ISAAI

MAI TO HUN

KEWAL

EK SAADHARAN INSAAN

Saturday, April 19, 2008

अनपढ़ की व्यथा


मैं अनपढ़ हूँ

सब कहते है की

मै अनपढ़ हूँ

मै भी कहती हूँ की

मै अनपढ़ हूँ

क्युकी पढा नही है मेने

कभी किसी स्कूल मै

देखा नही किताबो का ,

मुह भी कभी

मेरे लिए काला अक्षर

आज भी है भेंस बराबर

तभी तो सब कहते है

मै अनपढ़ हूँ

जब भी सोचती हूँ

पढ़ - लिखा इंसान कैशा होता है

तब सब कहते है

वह बडे - बडे स्कूल मै पढता है

चतुर , चालाक व बुद्धिमान होता है

क्या उन्हें पढ़ - लिखा कहते है

जो बडे - बडे स्कूल मै पढे

फिर भी हमे पढा न सके

हमारी तो छोड़ दो

जो अपनों के भी हो न सके

क्या उन्ही को कहते है पढ़ - लिखा

किताबे जिन्होंने चाटी खूब

और गरीबो का खून भी

वो चाट गए

हजम कर गए देश की दौलत

कागजो मै सारा काम कर गए .

मैं जानती हूँ की

मै अनपढ़ हूँ

क्युकी मै स्कूल नही गई

जाती भी कैसे

गरीब हूँ

पैसे नही थे उतने

अफ़सोस है मुझे भी, दुख है की

मै स्कूल नही गई

पर सोचती हूँ आज

क्या हर स्कूल जाने वाला

जिंदगी का पाठ भी सीख पाता है

शायद नही ,

क्युकी जो पाठ सीखा है मैंने

भूख से , गरीबी से ,

अपने उप्पर हुए अत्त्याचारो से

यही तो है जिंदगी का पाठ

जो मेने सीखा है हालातों से

शायद वो कभी सीख ना पाए

वैसे मै आजकल

दस्तखत करना सीख रही हूँ

फिर भी सब कहते है

मै अनपढ़ हूँ ।

written by :kamlabhandari

my blog : kamlabhandari.blogspot.com

Wednesday, April 16, 2008

बलात्कार


तन का बलात्कार हुआ

मन का बलात्कार हुआ

एषा लगता है मानो

जिस्म के हर अंग का

बलात्कार हुआ


तन को बिन मर्जी के छुआ

तन का बलात्कार

मन को बिन मर्जी के छुआ

मन का बलात्कार

एषा लगता है मानो

हर अंग का बलात्कार हुआ

जरुरी नही की बलात्कार हमेशा

chu कर हो

बिना छुए भी कई बार

आंखो से बलात्कार हुआ
बाहर ही नही घर मै भी

औरत की साँसों का

उसकी khusiyo का

का जीवन भर बलात्कार हुआ

Tuesday, April 15, 2008

कोन धरम है प्यारा जो बन सके हमारा .

कोन धरम है प्यारा
जो बन सके हमारा .
कोन धरम है प्यारा
जिसे कह सकू मै
ये है मेरा
सब कहते है
मै हिन्दू हूँ
पर मै कैसे कहू
की मै हिन्दू हूँ
क्युकी कर नही पाती
मै पूजा
उनकी तरह
चाहती हूँ
पर नियम नही रख
पाती हूँ
छू लेती हूँ भगवान् को
जब मन चाहता है
उन दिनों मै भी
जिन दिनो एक लड़की को
भगवान् के पास
जाने से भी
किया जाता है मना
क्या करू मै
ना भी छूना चाहू फिर भी छूना पड़ता है मन्दिर को
जब कोई कहता है
मन्दिर से माचिस लाने को
क्या कहू , कैशे कहू
की आज हूँ मै
उनसे अलग
सच कहू तो
कहना नही चाहती
इश अपमान को सहना नही चाहती
क्यों सहू मै गलती क्या है मेरी
ये नही है मर्जी मै हमारी
तो कैशे कहू की मै हिन्दू हूँ
तो कोन हूँ मै
क्या मै मुस्लिम हूँ
नही मै वो भी नही
क्युकी वो भी तो है
नियम के पक्के
और मै
बहुत ही कच्ची
और वहाँ तो
रहती है औरत
परदे मै पर मै तो
उड़ना चाहती हूँ
मन की मर्जी
करना चाहती हूँ
नही है मुझे
परदा प्यारा
वो बाँध देगा
जीवन सारा
तो कोन हूँ मै
क्या मै सिक्ख हूँ
क्यूंकि उन्ही की तरह
मुझे है प्यारी
मेरी खुद्दारी
पर शायद मै
वो भी नही
क्यूंकि सच्चे पंजाबी भी
नियम के पक्के होते है
और नियम
जिनसे मै कतराती हूँ
तो कोन हूँ मै
क्या मै इसाई हूँ
नही मै वो भी नही
क्युकी वो है
पवित्र बाइबल को मानते
और बाइबल
ध्यान देती है
सफ़ाई पर बहुत
वेसे सफ़ाई
मुझे भी है प्यारी
करती भी हूँ
रोज
घर की , कपड़ो की
पर चाहकर भी
कर नही पाती
मन मै भरी
गंदगी की सफाई
और बाइबल
इसी सफ़ाई को है
मानती
समझ नही आता
आख़िर कोन हूँ मै
केसे करू भेद
की कोन धरम है
प्यारा
जो हो सके मेरा
सबके चेहरे
दिखते है एक से
वही दो कान , दो आँखे
एक नाक , एक मुह
और खून का रंग भी
वही गहरा लाल
और करते भी है सब
उसी अद्रश्य
इश्वर , अल्लाह , वाहेगुरु , जीज़स
की पूजा
सब है एक से
फर्क है तो
चमरी का
पर रंग - बिरंगे
चमरी वाले
तो हर धरम मै है
कैशे करू भेद
की कोन धरम है
प्यारा
जो बन सके मेरा ।

Thursday, April 10, 2008

मै देखती हूँ सपने

मै देखती हूँ सपने
कुछ खुली आंखो से
कुछ बंद आंखो के सपने
कुछ ख़ूबसूरत तो
कुछ बद्सुरात सपने
मै देखती हूँ सपने
कुछ प्यारे ,कुछ सबसे न्यारे

कुछ सुख देने वाले
कुछ दुःख देने वाले सपने
मै देखती हूँ सपने
कुछ सफ़ेद , कुछ काले सपने

कुछ अपनों के , कुछ परायो के सपने
कुछ इश दुनिया , कुछ उष दुनिया के सपने
मै देखती हूँ सपने
जानती नही की पूरे होंगे

ये कभी हमारे होंगे
कभी हंसाते कभी रुलाते
फिर भी मै देखती हूँ सपने

पुरूष की कहानी स्त्री की जुबानी


पुरुष का मन कहता है
मै भी समाज का हिस्षा हू
औरो की तरह ,
बात करता है आज समाज
चर्चा करता है
औरतो की , लड़कियों की
बच्चो की , बुद्धों की
अमीरों की , गरीबो की
सबकी करता है
पर करता नही वो
बात कभी (पुरुष की ) मेरी
क्या मै नही समाज का हिस्षा ?
पुरुष हू तो क्या हुआ
क्या मैं इंसान नही
तुम ही तो कहते हो
मै समाज का अहम् हिस्षा हू
फिर क्यों हमेशा मुझसे नजर चुराते हो ।
चर्चा करते हो
औरत की रक्षा कौन करेगा
कौन दिलायेगा उनको हक़ ,
उनका कोटा कौन बढायेगा ,
उनकी लड़ाई कौन लड़ेगा
और महिला दिवश कैशे मनाया जायेगा ।
मैं ये नही कहता
की मुझे भी है
पुरुष दिवश की जरुरत ,
पर पुरुष हू तो क्या हुआ
मै भी तो एक इंसान हू
क्या नही है मुझे भी
रक्षा की , सहानभूति की ,
मदद की जरुरत ।
स्त्री के लिए लड़ने तो
सब आते है
पर मुझे हमेशा ही
अकेला क्यों छोड़ जाते है ?
अगर आशु मै अपने दिखाता नही
दख भी किसी को बताता नही
तो क्या नही है
मुझपर भी चर्चा की जरुरत ?
जानता हू समाज मै
स्त्रिया है काम , पुरुष है ज्यादा
और बनता भी है वो अपने को
सबसे कुछ ज्यादा
पर इंसान होने के नाते
मुझपर भी तो है
चर्चा की जरुरत
मुझे भी है आपके प्यार की जरुरत।

कभी - कभी

मुझे पछतावा होता है कभी - कभी
की मै बेटी हूँ
पर क्या बेटे को भी होता है
की वो बेटा है
मै रोती हू कभी - कभी
की मै बेटी हूँ
पर क्या बेटा भी रोता है
की वो बेटा है
मै हंसती हू कभी - कभी
की मै बेटी हू
पर क्या बेटा भी हँसता है
की वो बेटा है
मै सुनती हू गाली कभी - कभी
की मै बेटी हू
पर क्या बेटा भी सुनता है
की वो बेटा है
मै सुनती हू ताने हमेशा
की मै बेटी हू
पर क्या बेटा भी .......................